Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 20, Verses 10–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 20, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

यथा कलमरक्षिण्या गीत्या वितततालया । खगोत्सादेन सहितं गीतानन्दः प्रसाध्यते ॥ १० ॥ ज्ञानसत्पुरुषेहाभ्यामकर्त्रा कर्तृरूपिणा । तथा पुंसा निरिच्छेन सममासाद्यते पदम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

उनकी अभिवृद्धि का फल भी एक ही समय में होता है, इसे दुष्टान्तपूर्वक कहते है । जैसे पके हुए धान के खेत की रक्षा करनेवाली स्त्री को, जो कि पक्षियों को उड़ाने के लिए कोई दूसरा व्यापार नहीं करती है विस्तृत करतलध्वनि से युक्त गान से आयुषंगिक पक्षियों का निरास ओर गान का आनन्द एक ही काल में होता हे वैसे ही ज्ञानप्राप्ति में विघ्नभूत राग, मान आदि के निराकरण से ङच्छारहित अतएव कर्ता न होते हुए भी किये गये ज्ञान के हेतु श्रवण ओर सदाचार से कर्तारूप अर्थात्‌ केवल श्रवण और सदाचारमात्र का कर्तारूप पुरुष आनुषंगिक विघ्नो के निरास द्वारा परम पद को प्राप्त होता हे