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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 20, Verses 4–5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 20, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 4, 5

संस्कृत श्लोक

ज्ञानाच्छमादयो यान्ति वृद्धिं सत्पुरुषक्रमाः । श्लाघनीयाः फलेनान्तर्वृष्टेरिव नवाङ्कुराः ॥ ४ ॥ शमादिभ्यो गुणेभ्यश्च वर्धते ज्ञानमुत्तमम् । अन्नात्मकेभ्यो यज्ञेभ्यः शालिवृष्टिरिवोत्तमा ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे अन्नात्मक घृत आदि से युक्त यज्ञँ से धान आदि अन्नो की हेतु वृष्टि की अभिवृद्धि होती है, वैसे ही शम आदि गुणों से उत्तम ज्ञान की अभिवृद्धि होती है । यज्ञो से वृष्टि होती है, इस विषय में कहा भी है “अग्नौ प्रास्ताऽऽहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिवृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥” अर्थात्‌ अग्नि में भली भाँति दी गई आहुति आदित्य को प्राप्त होती है, आदित्य से वृष्टि होती हे, वृष्टि से अन्न होता है और अन्न से प्राणी होते हैं