Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verses 19–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 3, verses 19–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
परमार्थाम्बुधौ स्फारे राम सर्गतरङ्गकाः ।
भूयोभूयोऽनुवर्तन्ते त एवान्ये च भूरिशः ॥ १९ ॥
सर्वतः सदृशाः केचित्कुलक्रममनोगुणेः ।
केचिदर्धेन सदृशाः केचिच्चातिविलक्षणाः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्या आदि सम्पूर्ण पदार्थो की कल्पना का अधिष्ठान कहते हैं ।
हे राम, अतिविस्तृत परमार्थ सत्य (परमात्मा) रूपी महासागर मेँ वे प्राचीन और नूतन
सृष्टिरूपी तरंग बार-बार प्रचुरमात्रा मेँ चक्कर काटते हैं, उत्पत्ति ओर लय को प्राप्त होते हैं
उनमें से कुछ तो कुल, क्रम, मन और गुणों से सर्वथा समान होते हैं, कुछ आधी समानता
रखते हैं और कुछ बिलकुल निराले (अत्यन्त विलक्षण) होते हैं