Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 3, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
इमं व्यासङ्ग तत्र द्वात्रिंशं संस्मराम्यहम् ।
यथासंभवविज्ञानदृशा संलश्यमानया ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रस्तुत शंका के समाधान के उपोद्घात (भ्रूमिका) रूप से जगत् की व्यवस्था और प्रस्तुत
शास्त्र के विषय को कहकर शंका के समाधान का उपक्रम करते हैं ।
अठारह पुराण और महाभारत आदि के निर्माणरूप कार्यो से प्रसिद्ध यथोचित जन्म,
शास्त्रविज्ञान और ब्रह्मविद्या से उपलक्षित सर्वशास्त्रविशारद ये वेदव्यासजी उक्त सृष्टिरूपी
तरंगों में बत्तीसवें हैं, ऐसा मैं स्मरण करता हूँ