Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verses 22–24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 3, verses 22–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 22-24
संस्कृत श्लोक
द्वादशाल्पधियस्तत्र कुलाकारेहितैः समाः ।
दश सर्वे समाकाराः शिष्टाः कुलविलक्षणाः ॥ २२ ॥
अद्यपयन्ये भविष्यन्ति व्यासवाल्मीकयस्तथा ।
भृग्वङ्गिरःपुलस्त्याश्च तथैवाप्यन्यथैव च ॥ २३ ॥
नराः सुरर्षिदेवानां गणाः संभूय भूरिशः ।
उत्पद्यन्ते विलीयन्ते कदाचिच्च पृथक्पृथक् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
उन बत्तीसों में भी आवान्तर भेद कहते हैं।
उन अनेक तरंगों से ब्रह्मविद्, ब्रह्मविद्वर, ब्रह्मविद्वरीयान् और ब्रह्मविद्वरिष्ठ इस प्रकार
प्रसिद्ध चार भेदों में चतुर्थ स्थान में न पहुँचने के कारण अल्पबुद्धि बारह तरंग कुल, आकार,
जीवन, चेष्टा आयु सर्वाश में समान हैं, दस ज्ञानादि विषय में भी समान हैं और शेष वंश में
विलक्षण हैं (८) । पूर्वसदूश और उनसे विलक्षण व्यास तथा वाल्मीकि आगे होंगे, यही बात
भृगु, अंगिरा और पुलस्त्य आदि अन्यान्य ऋषियों के विषय में दुहराई जा सकती है अर्थात् वे
भी पूर्वसद्श और उनसे विलक्षण होंगे । मनुष्य, देवर्षिं ओर देवता बार बार उत्पन्न और
विलीन हुए हैं, होते हैं और होगे । ये लोग पहले भी इस प्रकार के आकार से सम्पन्न थे, इस
समय भी वैसे ही हैं इसके पश्चात् भी इस देह की अपेक्षा भिन्न-भिनन देहों में जन्म ग्रहण
करेंगे