Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 3, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
पिता शुकस्य सर्वज्ञो गुरुर्व्यासो महामतिः ।
विदेहमुक्तो न कथं कथं मुक्तः सुतोऽस्य सः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त सन्देह को ही दशति हैं।
श्रीशुकदेवजी के पिता और गुरु महामति सर्वज्ञ ये व्यासजी कैसे विदेहमुक्त न न हुए और
इनके पुत्र श्रीशुकदेवजी कैसे मुक्त हो गये ?