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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 3, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तिर्यक्पुरुषदेवादेर्यो नाम स विनश्यति । यस्मिन्नेव प्रदेशेऽसौ तदैवेदं प्रपश्यति ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अतिगूढ अभिप्राय के परिज्ञान द्वारा उसमें विशेष बात के कथन से श्रीराम द्वारा प्रोत्साहित पूर्वोक्त स्थूल प्रपंच के मिथ्यात्वबोधन के लिए यूक्ष्म प्रपंचमात्रता ही है, यों दशनिवाले वस्रिष्ठजी कहते हैं। पशु-पक्षी, मनुष्य, देवता आदि प्राणियों में से जो जिस स्थान पर और जब भी नाश को प्राप्त होता है, वह प्रत्यगात्मा उसी स्थान में तभी वक्ष्यमाण (कहे जानेवाले) त्रिजगत्‌ को देखता हे । अर्थात्‌ न तो दूसरे स्थान में देखता है और न कालान्तर में