Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 3, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
आतिवाहिकनाम्नान्तः स्वहृद्येव जगत्त्रयम् ।
व्योम्नि चित्तशरीरेण व्योमात्मानुभवत्यजः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
वह किस सामग्री से ओर किस स्वरूप से युक्त होकर देखता है ? इस पर कहते हैं।
आतिवाहिक (२) नामक चित्त, अहंकार, मन, बुद्धि, दस इन्द्रियों ओर प्राण से घटित
वासनामय सूक्ष्मशरीर से अपने हृदयरूपी आकाश में ही वासनामय त्रिजगत् का अनुभव करता
है ओर भ्रान्ति से वासनामय तत्-तत् शरीरों को क्रमशः प्राप्त होता है । वस्तुतः वह पूर्वोक्त
५ त्र्यणुक । परमाणुद्रयेनाणुस्त्रसरेणुस्तु ते त्रयः (व्र.वै.पु.).अणुद्रौ परमाणूस्यात्त्रसरेणुस्त्रयः
(भा.३/१२/५) अर्थात् दो परमाणु = एक अणु और तीन अणु = एक त्रसरेणु ।
२४ अतिवहनम्-अतिवाहः अर्थात् धूम, अर्चिरादि मार्गो के अभिमानी देवताओं द्वारा परलोक
में पहुँचाना, उक्त कर्म में जो दक्ष है, वह आतिवाहिक कहलाता है ।
चिदाकाशस्वरूप अतएव जन्मादिविकाररहित है