Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 4, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सौम्याम्बुत्वे तरङ्गत्वे सलिलस्याम्बुता यथा ।
समैवाब्धौ तथाऽदेहसदेहमुनिमुक्तता ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीव्यासदेवजी की वर्तमान काल में भी जीवन्मुक्तता दिखलाते है ।
इस समय भी ये श्रीव्यासजी वीतशोक, निर्भय, सब प्रकार की कल्पनाओं से शून्य,
प्रशान्तचित्त, निर्वाण सुखको प्राप्त अर्थात् बन्धनसे विनिर्मुक्त हैँ, अतएव ये जीवनमुक्त कहे
गये है । कभी जीवन्मुक्त प्राणी वित्त, बन्धु, बान्धव, अवस्था, कर्म, विद्या, विज्ञान ओर चेष्टा ओं
से तुल्य होते हैं और कभी तुल्य नहीं होते, कभी सैकड़ों बार उनका जन्म होता हे ओर कभी
बहुत कल्पो में एक बार भी उनका जन्म नहीं होता । इस माया का अन्त नहीं हे । जैसे तौलने
के लिए पुनः पुनः बराबर तराजू में भरी जाती हुई धान्यराशि में पहले जिस क्रम से बीज रहे थे,
उस क्रम से नहीं रहते, ऊपर नीचे हो जाते हैं वैसे ही यह बहुत से प्राणियों का समूह विप्यसिको
(परिवर्तन को) -पूर्व जन्म के क्रम तथा अवयवसंनिवेश की अपेक्षा विपरीत क्रम ओर देहसंगठन
को-प्राप्त होता हे । कालरूप महासागर तरंग पूर्वजन्म के अवयव संगठन अथवा क्रम से भिन्न
अवयवसंगठन अथवा क्रम से सृष्टि के रूप में आविर्भूत होते हैं ॥ ३ १-३५॥
जीवन्मुक्त पुरुष योगबल से आधिकारिक विविध शरीर धारण करनेपर भी मुक्तिस्वरूपसे
च्युत नहीं होता, ऐसा कहते है ।
अविद्यारूपी आवरण से रहित विद्वान् समाहित चित्त, विकल्पविरहित स्वरूपभूत सार से
ओतप्रोत अर्थात् चिन्मय एवं परम शान्तिरूपी अमृत से तृप्त रहता है । चंचलता, विकल्प,
असार देहआदि रूपता, अशान्ति और अतृप्ति अविद्यारूपी आवरण से होती है उक्त आवरण
के नष्ट हो जाने से चित्त समाहित हो जाता है विकल्प नष्ट हो जाते हैं, चिन्मयता प्राप्त हो
जाती है ओर परमशान्तिरूपी सुधा से तृप्ति प्राप्त हो जाती हे । निष्कर्षं यह कि जीवनमुक्ति
ही ज्ञान का फल है और वह ज्ञान से ही होती है, अन्य कर्म आदि से नहीं ॥ ३ ६॥
तीसरा सर्ग समाप्त
चौथा सर्ग
मुक्तों के अनुभव से सदेह ओर विदेह मुक्तियों में समानता वर्णन और ज्ञान की
दृढता के लिए शास्त्रीय पौरुष की प्रशंसा ।
नित्यमुक्तस्वभाव आत्मा का अज्ञानरूप आवरण ही बन्धन है और ज्ञान से उसका
विनाश ही मुक्ति है । जैसे यह चित्रलिखित बाघ है, सचमुच नहीं है, ऐसा ज्ञान हो जाने
पर बाघ का डर नहीं रहता प्रत्युत उसे देखने मे आनन्द ही आता है, वैसे ही अज्ञान के
नष्ट हो जाने पर यह दुश्यमान व्यवहार कौतूहल का ही कारण होता है, अनर्था का हेतु नहीं
होता, इसलिए जीवन्मुक्ति ओर विदेहमुक्त में कोई अन्तर नहीं है, इस प्रकार पूर्व शंका
का समाधान करके प्रस्तुत आत्मतत्व का विस्तार से उपदेश देने के लिए पहले मूल की
ढता के लिए पुरुषार्थ का समर्थन करते हैं ।
वसिष्ठजी ने कहा : हे सौम्य, जैसे समुद्र में जलकी निश्चलावस्था में और तरंगित दशा में
जलत्व एक-सा ही है, उसमें किसी प्रकार का अन्तर नहीं है वैसे ही विदेहमुक्त और जीवन्मुक्त
मुनिकी स्वस्वरूप में अवस्थिति तुल्य ही हैं