Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 4, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
सदेहा वास्त्वदेहा वा मुक्तता विषये न च ।
अनास्वादितभोगस्य कुतो भोज्यानुभूतयः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
मुक्ति चाहे सदेह हो अथवा विदेह हो, वह विषयाधीन तो कदापि नहीं है। यदि मुक्ति स्वर्गा
आदि के समान विषयाधीन होगी, तो वह भी उसी प्रकार विषयों के वैषम्य से अवश्य विषम होगी,
यह भाव है। यदि कोई कहे कि फिर भी उक्त दोनों मुक्तियों में भोक्तत्व और अभोक्तृत्व से जनित
अन्तर तो है ही, क्योकि सदेह मुक्ति में देहस्थिति भोग के लिए ही है, इस पर कहते हैं।
जिसने सत्यत्वबुद्धि से भोगों का आस्वादन ही नहीं किया, उसमें भोग्य की अनुभूति कहाँ
से होगी अर्थात् भोगों में सत्यत्वबुद्धि से भोक्तृत्व के अभिमान से भोग का आस्वादन करने पर
भोगकृत अन्तर होगा, किन्तु असंग उदासीन आत्मेकत्वदर्शी में उक्त अभिमान ही नहीं हे