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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verses 3–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 4, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 3 ,4

संस्कृत श्लोक

जीवन्मुक्त मुनिश्रेष्ठं केवलं हि पदार्थवत् । पश्यामः पुरतो नास्य पुनर्विघ्नोऽन्तराशयम् ॥ ३ ॥ सदेहादेहमुक्तानां भेदः को बोधरूपिणाम् । यदेवाम्बुतरङ्गत्वे सौम्यत्वेऽपि तदेव तत् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

तब ये सदेह कैसे हैं, इस पर कहते हैं। जीवनमुक्त मुनिश्रेष्ठ श्रीवेदव्यासजी को सदेह के सदृश केवल हम अपनी कल्पना से सामने देखते हँ, इन्हें अपने विदेहत्वनिश्चय के प्रति किरी प्रकार का विघ्न नहीं है आशय यह कि यद्यपि हम लोग अपनी कल्पना से इन्हें सदेह-सा देखते हैं तथापि ये अपने निश्चय से विदेह ही हैँ, अतएव अपने अनुभव से इनमें कोई अन्तर नहीं हे । ज्ञानरूपी (चिन्मय) सदेहमुक्त (जीवन्मुक्त) ओर विदेहमुक्त में क्या भेद है ? अर्थात्‌ अज्ञान ही भेदक है, उसके नष्ट होने पर केवल ज्ञान के अवशिष्ट रहने पर भेदक कौन है ? कोई नहीं । जल की तरंगावस्था में जो जल है, वही सौम्यावस्था में (निश्चलावस्था में) भी है, उसमें कोई अन्तर नहीं हे