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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 5, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । प्रवृत्तिरेव प्रथमं यथाशास्त्रविहारिणाम् । प्रभेव वर्णभेदानां साधनी सर्वकर्मणाम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्व में जो यह कहा था कि दैव पौरुष से अतिरिक्त नहीं है, दैव से पौरुष प्रबल है और पौरुष से ही पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, उक्त सबका युक्ति से समर्थन करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : जैसे नीला, पीला आदि रंगों की अभिव्यक्ति में प्रकाश ही मुख्य कारण है, वैसे ही शास्त्र के अनुसार कायिक, वाचिक और मानसिक व्यवहार करनेवाले अधिकारी पुरुषों के सब पुरुषार्थो की सिद्धि में प्रवृत्ति ही मुख्य कारण है

सर्ग सन्दर्भ

चौथा सर्ग समाप्त पाँचवाँ सर्ग पौरूष के प्रबल होने पर अवश्य फलप्राप्ति में एवं दैव की पुरुषार्थ से अभिन्नता में युक्ति ओर दृष्टान्तो का प्रदर्शन ।