Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verses 2–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 5, verses 2–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 2-6
संस्कृत श्लोक
मनसा वाञ्छते यच्च यथाशास्त्रं न कर्मणा ।
साध्यते मत्तलीलासौ मोहनी नार्थसाधनी ॥ २ ॥
यथा संयतते येन तथा तेनानुभूयते ।
स्वकर्मैवेति चास्तेऽन्या व्यतिरिक्ता न दैवदृक् ॥ ३ ॥
उच्छास्त्रं शास्त्रितं चेति द्विविधं पौरुषं स्मृतम् ।
तत्रोच्छास्त्रमनर्थाय परमार्थाय शास्त्रितम् ॥ ४ ॥
द्वौ हुडाविव युध्येते पुरुषार्थौ समासमौ ।
प्राक्तनश्चैहिकश्चैव शाम्यत्यत्राल्पवीर्यवान् ॥ ५ ॥
अतः पुरुषयत्नेन यतितव्यं यथा तथा ।
पुंसा तन्त्रेण सद्योगाद्येनाश्वद्यतनो जयेत् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
विद्या तृप्ति आदि के समान द्ृष्टफलक है, उसके साधन में शास्त्रीय नियम का क्या
उपयोग है ? इस पर कहते हैं।
पुरुष जिसकी केवल मन से इच्छा करता है, शास्त्रानुसार कर्म से नहीं करता, वह उन्मत्त
की चेष्टा ही करता है, वह पुरुषार्थ का साधन नहीं है, बल्कि मोह का साधन है। सारांश यह
कि यद्यपि विद्या दृष्टफलक है, तथापि विद्या के साधन में अशास्त्रीय नियम कारण नहीं हो
सकता, क्योंकि अन्वयव्यतिरेक नहीं है । शास्त्रीय यत्न का शास्त्रीय ही फल होता है और
अशास्त्रीय यत्न का अशास्त्रीय ही फल होता है, इस प्रकार औचित्य के बल से भी व्यवस्था की
सिद्धि होती है जो आदमी जैसा प्रयत्न करता है, वह वैसा ही फल पाता हे । प्राक्तन (पूर्व
जन्म का) स्वकर्म ही दैव कहलाता है, उससे अतिरिक्त दैव कुछ नहीं है । पौरुष दो प्रकार का
है-एक शास्त्रानुमोदित और दूसरा शास्त्रविरूद्ध । उनमें शास्त्रविरुद्ध कर्म अनर्थ का कारण है
ओर शासत्रानुमोदित कर्म परमार्थवस्तु की प्राप्ति का कारण हे । कहीं पर सम और कहीं पर
असम प्राक्तन और ऐहिक दो पुरुषार्थ भेड़ों की तरह परस्पर लड़ते हैं, उनमें जो कम बलवाला
होता है, वह नष्ट हो जाता है । इसलिए पुरुष को शास्त्रीय प्रयत्न से सज्जन महात्माओं के संग
के द्वारा वैसा उद्योग करना चाहिए जिससे कि इस जन्म का पौरुष पूर्व जन्म के पौरुष को शीघ्र
जीत ले