Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 5, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
द्वौ हुडाविव युध्येते पुरुषार्थौ समासमौ ।
आत्मीयश्चान्यदीयश्च जयत्यतिबलस्तयोः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रिभिऋणेऋणवान् जायते“ इस श्रुति से मनुष्य, देवता आदि का ऋणी, युना जाता है
ओर (तस्मादेषां तन्न प्रियमेतन्मनुष्या विद्युः“ (इसलिए देवताओं को यह प्रिय नहीं है कि
मनुष्य आत्मतत्त्वज्ञानी होवे) ऐसी भी श्रुति है, इसलिए वे देवता अवश्य विघ्न करेगे, उनके
विध्न करने पर किया गया प्रयत्न ही विफल हो जायेगा, ऐसी आशंका कर कहते है ।
सम ओर विषम अपना ओर दूसरे का पुरुषार्थ- ये दोनों भेड़ों की तरह लड़ते हैं उन
दोनों मेँ जो अतिबलवान् होता है, वह जीत जाता है । भाव यह है कि दोषों के रहते ही
देवता विघ्न कर सकते हैं, अपने प्रयत्न से दोषोपर विजय पाने से उनकी विघ्नशक्ति
कुण्ठित हो जाती हे