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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verses 15–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 5, verses 15–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 15-22

संस्कृत श्लोक

संसारकुहरादस्मान्निर्गन्तव्यं स्वयं बलात् । पौरुषं यत्नमाश्रित्य हरिणेवारिपञ्जरात् ॥ १५ ॥ प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत देहं नश्वरमात्मनः । संत्यजेत्पशुभिस्तुल्यं श्रयेत्सत्पुरुषोचितम् ॥ १६ ॥ किंचित्कान्तान्नपानादिकलिलं कोमलं गृहे । व्रणे कीट इवास्वाद्य वयः कार्यं न भस्मसात् ॥ १७ ॥ शुभेन पौरुषेणाशु शुभमासाद्यते फलम् । अशुभेनाशुभं नित्यं दैवं नाम न किंचन ॥ १८ ॥ प्रत्यक्षमानमुत्सृज्य योऽनुमानमुपैत्यसौ । स्वभुजाभ्यामिमौ सर्पाविति प्रेक्ष्य पलायते ॥ १९ ॥ दैवं संप्रेरयति मामिति दग्धधियां मुखम् । अदृष्टश्रेष्ठदृष्टीनां दृष्ट्वा लक्ष्मीर्निवर्तते ॥ २० ॥ तस्मात्पुरुषयत्नेन विवेकं पूर्वमाश्रयेत् । आत्मज्ञानमहार्थानि शास्त्राणि प्रविचारयेत् ॥ २१ ॥ चित्ते चिन्तयतामर्थं यथाशास्त्रं निजेहितैः । असंसाधयतामेव मूढानां धिग्दुरीप्सितम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे विष्णु असुरो द्वारा प्रयुक्त माया रभ्‌ स्वयम्‌“ विशेषण निःशेषतता का सूचक है, अन्य से शान्ति होने पर उसके (शामक अन्य के) हटने पर फिर उसका उद्भव हो सकता है वह न हो इसलिए 'स्वयम्‌” यह विशेषण दिया है । रूप पिंजड़े से स्वयं बलपूर्वक निकल गये । अथवा जैसे सिंह मनुष्यों से बनाये गये बन्धरूप पिंजडे से स्वयं बलपूर्वक निकल जाता है, वैसे ही मनुष्यों को पौरुषरूप यत्न का अवलम्बन कर इस संसाररूप गर्तं से स्वयं बलपूर्वक निकल जाना चाहिए । अपने शरीर को प्रतिदिन नश्वर देखें, पशुओं के साथ समानता को छोड दें अर्थात्‌ पशुता का स्वीकार न करें, किन्तु सत्पुरुषो के योग्य साधु संगम और सत्‌शास्त्रौ का अवलम्बन करे । जैसे कीड़ा घाव में पीव आदि द्रव पदार्थ का आस्वादन करता हे, वैसे ही घर में रत्री, अन्न, पान आदि द्रव ओर कोमल पदार्थो का आस्वादन लेकर सम्पूर्ण पुरुषार्थो के साधनभूत यौवन को व्यर्थ नहीं कर देना चाहिए । शुभ पुरुष प्रयत्न से शीघ्र शुभ फल प्राप्त होता है ओर अशुभ पुरुष प्रयत्न से अशुभ फल मिलता हे । पूर्वजन्म के शुभ ओर अशुभ पुरुष प्रयत्न के सिवा देव नाम की कोई वस्तु नहीं है। जो मनुष्य प्रत्यक्ष प्रमाण का त्याग कर अनुमान प्रमाण का अवलम्बन करता हे, वह अपनी बाहुओं को ये सर्प है, ऐसा समझकर उनसे भयभीत होकर भागता हे । विश्वामित्र आदि श्रेष्ठ पुरुषों ने पुरुष प्रयत्न से ही पुरुषार्थ (परम लक्ष्य) प्राप्त किया था, इस बात को न जाननेवाले अतएव मुञ्चे देव प्रेरित कर रहा है, ऐसा कहनेवाले दुर्बुद्धियों का मुख देखकर लक्ष्मी लौट जाती है। इसलिए पहले पुरुष प्रयत्न से नित्यानित्यवस्तु विवेक आदि चार साधनों का अवलम्बन लेना चाहिए और आत्मज्ञानरूपी महान्‌ अर्थवाले शास्त्रों का विचार करना चाहिए। शास्त्रानुसार श्रवण, मनन आदि चेष्टाओं द्वारा परमार्थभूत आत्मतत्त्वका विचार न कर रहे अतएव उक्त पुरूषार्थसाधन से शून्य मूढ पुरुषों की अनन्त नरकों की हेतु होने के कारण अतिदुष्ट भोगेच्छा के लिए धिक्कार है अर्थात्‌ ऐसे पुरुष शोचनीय हैं