Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verses 9–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 5, verses 9–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 9-14
संस्कृत श्लोक
परं पौरुषमाश्रित्य दन्तैर्दन्तान्विचूर्णयन् ।
शुभेनाऽशुभमुद्युक्तं प्राक्तनं पौरुषं जयेत् ॥ ९ ॥
प्राक्तनः पुरुषार्थोऽसौ मां नियोजयतीति धीः ।
बलादधस्पदीकार्या प्रत्यक्षादधिका न सा ॥ १० ॥
तावत्तावत्प्रयत्नेन यतितव्यं सुपौरुषम् ।
प्राक्तनं पौरुषं यावदशुभं शाम्यति स्वयम् ॥ ११ ॥
दोषः शाम्यत्यसंदेहं प्राक्तनोऽद्यतनैर्गुणैः ।
दृष्टान्तोऽत्र ह्यस्तनस्य दोषस्याद्य गुणैः क्षयः ॥ १२ ॥
असद्दैवमधःकृत्वा नित्यमुद्रिक्तया धिया ।
संसारोत्तरणं भूत्यै यतेताऽऽधातुमात्मनि ॥ १३ ॥
न गन्तव्यमनुद्योगैः साम्यं पुरुषगर्दभैः ।
उद्योगस्तु यथाशास्त्रं लोकद्वितयसिद्धये ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसको भी जीत लेना चाहिए यह भाव है।
अपने उत्कृष्ट पौरुष का अवलम्बन कर दाँतों से दाँतों को पीस रहे पुरूष को अपने शुभ
पौरुष से विघ्न करने के लिए उद्यत पूर्वं जन्म के अशुभ पौरुष को जीत लेना चाहिए । यह
प्राचीन पौरुष मुझे प्रेरित करता है, इस प्रकार की बुद्धि को बलपूर्वक कुचल डालना चाहिए,
क्योंकि वह प्रत्यक्ष प्रयत्न से अधिक बलवान् नहीं हे । तब तक पौरुष पूर्वक भलीभाँति प्रयत्न
करना चाहिए जब तक कि प्राक्तन (पूर्वजन्म का) अशुभ पौरुष स्वयं (४६) (निःशेष) शान्त
हो जाय । इस जन्म के गुणों से (शुभ पौरुष से) पूर्वजन्म का दोष (अशुभ पौरुष) अवश्य नष्ट
हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है आज के गुणों से (लंघन आदि से) कल के दोष का
(अजीर्ण आदिका) क्षय इसमें दृष्टान्त हे । पूर्व जन्म के दुरदृष्ट का ऐहिक शुभ कर्मो से सदा
उद्योगशील बुद्धि द्वारा तिरस्कार कर अपने में संसार को तरने के लिए सम्पादनार्थ (मुक्त्यर्थ)
शम, दम, श्रवण आदि सम्पत्ति के लिए यत्न करना चाहिए । आलसी पुरुष गदहे से भी निकृष्ट
है, अतएव उद्योगहीन होकर गर्दभ तुल्य नहीं बनना चाहिए, किन्तु स्वर्ग ओर मोक्ष की सिद्धि
के लिए शास्त्रानुसार सदा यत्न करना चाहिए