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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 5, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

बाल्ये गतेऽविरतकल्पितकेलिलोले दोर्दण्डमण्डितवयःप्रभृति प्रयत्नात् । सत्सङ्गमैः पदपदार्थविशुद्धबुद्धिः कुर्यान्नरः स्वगुणदोषविचारणानि ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

आदि में समर्थ भुजाओं से अलंकृत अवस्था से (योवनावस्था से) लेकर पद-पदार्थ ज्ञान में निपुण (व्युत्पन्न) पुरुष गुरु, सतीर्थ्य, अपने से अधिक ज्ञाताओं के संग से अपने गुणों का (भक्ति, दया आदि का), दोषों का (राग-द्वेष आदि का) विचार (शान्ति आदि से अन्त में कल्याण होता है ओर राग आदि से अनर्थ की प्राप्ति होती है, इस प्रकार का पर्यालोचनरूप विचार) करें