Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, Verses 20–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 6, verses 20–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 20-23
संस्कृत श्लोक
मेघेन नीयते यद्वद्वत्सरोपार्जिता कृषिः ।
मेघस्य पुरुषार्थोऽसौ जयत्यधिकयत्नवान् ॥ २० ॥
क्रमेणोपार्जितेऽप्यर्थे नष्टे कार्या न खेदिता ।
न बलं यत्र मे शक्तं तत्र का परिदेवना ॥ २१ ॥
यन्न शक्नोमि तस्यार्थे यदि दुःखं करोम्यहम् ।
तदमारितमृत्योर्मे युक्तं प्रत्यहरोदनम् ॥ २२ ॥
देशकालक्रियाद्रव्यवशतो विस्फुरन्त्यमी ।
सर्व एव जगद्भावा जयत्यधिकयत्नवान् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
ओले आदि गिरने से खेती के विनाश आदि में इससे विपरीत ही (पौरुष से दैव ही प्रबल)
देखा जाता है, ऐसी आशंका करके उक्त दृष्टान्त भी हमारे अभीष्ट की ही सिद्धि करता है,
ऐसा कहते हैं।
जैसे मेघ किसानों द्वारा वर्ष भर में कमाई गई खेती को एक ही दिन में विनष्ट कर देता है,
यह मेघ का ही पुरुषार्थ है, वैसे ही और जगह भी समझना चाहिए जो अधिक प्रयत्न करता है,
उसकी जीत होती ही है। वस्तुतः तो वहाँ पर भी किसान का पूर्व जन्म का पुरुषप्रयत्न ही
अदृष्ट द्वारा कारण हे । क्रमशः उपार्जित धन का विनाश हो जाने पर भी खेद नहीं करना
चाहिए जहाँ पर अपना कुछ वश नहीं चलता, वहाँ पर क्या खेद करना ? वहाँ पर पुन: उद्योग
करना ही उचित है । जिस कार्य को हम लोग कर नहीं सकते, जो हमारी शक्ति के बाहर है,
उसके लिए यदि हम दु:ख करें, तो हमने मृत्यु का विनाश नहीं किया, वह कभी न कभी हमें मार
डालेगा, यों सोच कर प्रतिदिन रोना चाहिए । इस संसार के सम्पूर्ण पदार्थ देश, काल, क्रिया
और द्रव्य के अनुसार स्फूर्ति को प्राप्त होते हैं, जिस विषय में मनुष्य अधिक प्रयत्न करता है,
उसमें विजयी होता हे