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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, Verses 24–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 6, verses 24–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 24-29

संस्कृत श्लोक

तस्मात्पौरुषमाश्रित्य सच्छास्त्रैः सत्समागमैः । प्रज्ञाममलतां नीत्वा संसारजलधिं तरेत् ॥ २४ ॥ प्राक्तनश्चैहिकश्चेमौ पुरुषार्थौ फलद्द्रुमौ । संजातौ पुरुषारण्ये जयत्यभ्यधिकस्तयोः ॥ २५ ॥ कर्म यः प्राक्तनं तुच्छं न निहन्ति शुभेहितैः । अज्ञो जन्तुरनीशोऽसावात्मनः सुखदुःखयोः ॥ २६ ॥ ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्गं नरकमेव वा । स सदैव पराधीनः पशुरेव न संशयः ॥ २७ ॥ यस्तूदारचमत्कारः सदाचारविहारवान् । स निर्याति जगन्मोहान्मृगेन्द्रः पञ्जरादिव ॥ २८ ॥ कश्चिन्मां प्रेरयत्येवमित्यनर्थकुकल्पने । यः स्थितोऽदृष्टमुत्सृज्य त्याज्योऽसौ दूरतोऽधमः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस देश में जिस काल में प्रयत्न विफल हो जाय, उसका त्याग कर दूसरे देश में, दूसरे काल में, दूसरी क्रिया से और दूसरे द्रव्य से पुनः प्रयत्न करना चाहिए, क्योकि पूर्व आदि दिशाओं में विघ्न आने पर भी श्रीविश्वामित्रजी के तप की उत्तर दिशा में सिद्धि हुई थी, यह तात्पर्य है । इसलिए अधिकारी मनुष्य को पुरुषार्थ का अवलम्बन कर, सत्‌ शास्त्रों के अभ्यास और सत्संगति द्वारा बुद्धि को निर्मल बना कर संसाररूप सागर से अपना उद्धार करना चाहिए ये इस जन्म और पूर्व जन्म के दोनों पौरुष पुरुषरूपी अरण्य में उत्पन्न फल देने में समर्थ वृक्ष हैं, उनमें से जो अधिक बलवान्‌ होता है, वह विजयी होता है। यहाँ पर जड़ का उच्छेद होने से एक के सूखने पर दूसरे का उगना जय हे । जो पुरुष अपने ऐहिक शुभ कर्मो से पूर्वजन्म के तुच्छ कर्म का विनाश नहीं करता, वह अज्ञानी जीव अपने सुख और दुःख में असमर्थ है, भाव यह कि ऐसे लोग अपने दुःख के परिहार में और सुख के उत्पादन में अत्यन्त उदासीन हैं। वह पुरूष ईश्वर की प्रेरणा से पुण्य और पाप के बिना ही स्वर्ग अथवा नरक को जाता है, वह सदा पराधीन रहता है, वह सचमुच पशु ही है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । जो पुरुष उदार स्वभाव से प्रयत्न करने में कुशल और सदाचारी हैं, वे पुरुष जैसे सिंह अपने उद्यम से पिंजड़े से निकल जाता है, वैसे ही जगन्मोह से निकल जाते हैं। जो पुरूष कर्म का त्यागकर कोई पुरुष (ईश्वर) मुझे प्रेरित कर रहा है, इस प्रकार अनर्थकारिणी कुकल्पना में स्थित है, उसका दूर से ही त्याग कर देना चाहिए, वह नराधम है