Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 6, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
पौरुषेण कृतं कर्म दैवाद्यदभिनश्यति ।
तत्र नाशयितुर्ज्ञेयं पौरुषं बलवत्तरम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जहाँ कहीं दैव की प्रबलता प्रसिद्ध है, वहाँ पर भी पौरुष की ही प्रबलता है, यह कहते हैं।
यदि कहीं पर पुरुषप्रयत्न से किया गया कर्म दैव से (भाग्य से) विनष्ट हो जाय, तो वहाँ
पर भी नाश करनेवाले के पौरुष को बलवत्तर समझना चाहिए