Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, Verses 8–16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 6, verses 8–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 8-16
संस्कृत श्लोक
यदेकवृन्तफलयोरथैकं शून्यकोटरम् ।
तत्र प्रयत्नः स्फुरितस्तथा तद्रससंविदः ॥ ८ ॥
यत्प्रयान्ति जगद्भावाः संसिद्धा अपि संक्षयम् ।
क्षयकारकयत्नस्य ह्यत्र ज्ञेयं महद्बलम् ॥ ९ ॥
द्वौ हुडाविव युध्येते पुरुषार्थौ परस्परम् ।
य एव बलवांस्तत्र स एव जयति क्षणात् ॥ १० ॥
भिक्षुको मङ्गलेभेन नृपो यत्क्रियते बलात् ।
तदमात्येभपौराणां प्रयत्नस्य बलं महत् ॥ ११ ॥
पौरुषेणान्नमाक्रम्य यथा दन्तेन चूर्ण्यते ।
अन्यः पौरुषमाश्रित्य तथा शूरेण चूर्ण्यते ॥ १२ ॥
अन्नभूता हि महतां लघवो यत्नशालिनाम् ।
यथेष्टं विनियोज्यन्ते तेन कर्मसु लोष्टवत् ॥ १३ ॥
शक्तस्य पौरुषं दृश्यमदृश्यं वापि यद्भवेत् ।
तद्दैवमित्यशक्तेन बुद्धमात्मन्यबुद्धिना ॥ १४ ॥
भूतानां बलवद्भूतं यन्न दैवमिति स्थितम् ।
तत्तेषामप्यधिष्ठातृ सतामेतत्स्फुटं मिथः ॥ १५ ॥
शास्त्रामात्येभपौराणामविकल्पा स्वभावधीः ।
या सा भिक्षुकराज्यस्य कर्तृ धर्तृ प्रजास्थितेः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
पुरुष के अधीन जो विषय हैं, उन्हीं में ऐसा हो सकता है, जो पुरूष के अधीन नहीं है, वे तो
दैव पर ही निर्भर हैं - इस पर कहते हैं।
जहाँ एक टहनी में लगे हुए दो फलों में एक फल खोखला (रसशून्य) होता है वहाँ पर
उसके रस का उपभोग करनेवाले मनुष्य या कीड़े आदिका, पूर्वजन्म का या इस जन्म का,
प्रयत्न ही (पौरुष ही) उसके रस का विनाशक होता हे । यहाँ पर जगत् में संसिद्ध पदार्थ भी
विनाश को प्राप्त हो जाते हैं, वहाँ पर विनाश करनेवाले का प्रयत्न अधिक बलवान् है, यह
समझना चाहिए । पूर्वजन्म के ओर इस जन्म के कर्म (पौरूष) दो भेड़ों की भाँति परस्पर लड़ते
हैं, उनमें जो बलवान् होता है, वही दूसरे को क्षणभर में पछाड़ देता है राजवंश के न रहने पर
मन्त्री आदि द्वारा प्रेरित अलंकृत हाथी किसी भिक्षुक को लाकर जो बलात् राजा बना देता हे,
वह मन्त्री, हाथी ओर नगरवासियों के प्रयत्न का महान् बल है । भाव यह कि भिक्षुक का
राज्यप्राप्ति के अनुकूल पूर्वजन्म का पुण्य होने पर भी मन्त्री आदि का पौरुष भी उसमें अन्यतर
कारण कहा जा सकता हे । यदि मन्त्री लोग हाथी को भेजना आदि उद्योग न करते, तो भिक्षुक
का लड़का कदापि राजा न हो सकता । निस्सन्देह मन्त्रियों का पुरुषप्रयत्न भिश्चुक के राज्यलाभ
में सहकारी कारण है ओर भिक्षुक का बलवान् पुण्य मुख्य कारण हे । यह अवश्य स्वीकार
करना होगा कि पुरुषप्रयत्न ही एक एेसी चीज है जो साधारण व्यक्ति को भी बड़ा से बड़ा पद
प्रदान करा सकती हे । जैसे पुरुषप्रयत्न से भक्षण करने योग्य अन्न को मुँह में दबाकर फिर
दाँतों से चूर चूर किया जाता है वैसे ही बलवान् पुरुष पौरुषका अवलम्बन कर दुर्बल को पीस
डालता है । अतः प्रयत्नशील महाबली पुरुषों के अल्प बलवाले पुरुष उपभोग होते हैं, इसलिए
वे उनको ढेले के सदुश अपनी इच्छानुसार कर्म में नियुक्त करते हैँ । असमर्थ ओर अल्पबुद्धि
पुरुष बलवान् ओर बुद्धिमान् पुरुष के पौरुष को तत् तत् पुरुषप्रयत्न को, चाहे वह दृश्य हो
चाहे अदृश्य, अपनी अज्ञानता के वश उसे देव" या अदृष्ट समझता हे । उन समर्थ प्राणियों में
जो अधिक बलवान् प्राणी होता है, वह औरों का नियन्ता होता है, यह बात सभी विद्यमान
प्राणियों में परस्पर स्पष्ट है; दैव कोई वस्तु नहीं है, यह निश्चित है । भाव यह कि पूर्वोक्त
समर्थ पुरुषों की अपेक्षा अधिक समर्थ अन्य पुरुष भी हैं, वे उनके उपर शासन करते हैँ ।
अतएव वर्तमान प्राणियों में इस प्रकार पुरुषप्रयत्न ही दिखाई देता है, उससे अन्य कुछ नहीं
दिखाई देता । अतः दैव कोई पदार्थ नहीं है, यही समझना युक्तियुक्त हे । शास्त्र, मन्त्री, हाथी
और नगरवासियों की एकमत्य को प्राप्त हुई स्वाभाविक बुद्धि ही भिक्षुक को राजा बनानेवाली
और प्रजा की रक्षिका है