Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 8, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 8, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । नाकृतिर्न च कर्माणि न स्पन्दो न पराक्रमः । तन्मिथ्याज्ञानवद्रूढं दैवं नाम किमुच्यते ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार दैव का निराकरण कर पौरुष की स्वतन्त्रता का समर्थन करनेपर भी विश्वास न होने के कारण भ्रम में पड रहे और पहले स्वयं विस्तार से वर्णित (& ) एवं अनेक श्रुति, स्मृति, पुराण और इतिहास में प्रसिद्ध दैव का अपलाप करना कठिन ही नहीं असंभव है यो समझ रहे श्रीरामवन्द्रजी को मुखाकृति आदि से ताड़कर जव तक श्रीरामचन्द्रजी को दैव की स्वतन्त्रता में उपजीव्याविरोध नहीं दिखलाया जायेगा तबतक उन्हे विश्वास नहीं होगा, इसलिए उसको दिखलाने की इच्छा से श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्र, जिसकी न जाति है या न अनुगत शरीर के अवयवों का संगठन ही है, न कर्म हैं, न चेष्टाएँ हैं और न किसी प्रकार का पराक्रम ही है उस दैव का कैसा स्वरूप है इस बात को निर्णयपूर्वक यथार्थरूप से कोई नहीं बतला सकता, चूँकि उसे बताना कठिन ही नहीं असम्भव है, इसलिए मिथ्याज्ञान के समान उसकी केवल लोकप्रसिद्धिमात्र हे

सर्ग सन्दर्भ

सातवाँ सर्ग समाप्त आठवाँ सर्ग पूर्व सर्ग में प्रचुर उदाहरणों द्वारा वर्णित दैवमिथ्यात्वका, उपजीव्यविरोध आदि युक्तियों से भी, समर्थन ।