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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 8, Verses 2–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 8, verses 2–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 2-17

संस्कृत श्लोक

स्वकर्मफलसंप्राप्ताविदमित्थमितीति याः । गिरस्ता दैवनाम्नैताः प्रसिद्धिं समुपागताः ॥ २ ॥ तत्रैव मूढमतिभिर्दैवमस्तीति निश्चयः । आत्तो दुरवबोधेन रज्ज्वामिव भुजंगमः ॥ ३ ॥ ह्यस्तनी दुष्क्रियाभ्येति शोभां सत्क्रियया यथा । अद्यैवं प्राक्तनी तस्माद्यत्नात्सत्कार्यवान्भवेत् ॥ ४ ॥ मूढानुमानसंसिद्धं दैवं यस्यास्ति दुर्मतेः । दैवाद्दाहोऽस्ति नैवेति गन्तव्यं तेन पावके ॥ ५ ॥ दैवमेवेह चेत्कर्तुं पुंसः किमिव चेष्टया । स्नानदानासनोच्चारान्दैवमेव करिष्यति ॥ ६ ॥ किंवा शास्त्रोपदेशेन मूकोऽयं पुरुषः किल । संचार्यते तु दैवेन किं कस्येहोपदिश्यते ॥ ७ ॥ न च निस्पन्दता लोके दृष्टेह शवतां विना । स्पन्दाच्च फलसंप्राप्तिस्तस्माद्दैवं निरर्थकम् ॥ ८ ॥ न चामूर्तेन दैवेन मूर्तस्य सहकर्तृता । पुंसः संदृश्यते काचित्तस्माद्दैवं निरर्थकम् ॥ ९ ॥ मिथोऽङ्गानि समासाद्य द्वयोरेकैककर्तृता । हस्तादीनां हतत्वे ह न दैवेन क्वचित्कृतम् ॥ १० ॥ मनोबुद्धिवदप्येतद्दैवं नेहानुभूयते । आगोपालं कृतप्रज्ञैस्तेन दैवमसत्सदा ॥ ११ ॥ पृथक्चेद्बुद्धिरन्योऽर्थः सैव चेत्कान्यता तयोः । कल्पनायां प्रमाणं चेत्पौरुषं किं न कल्प्यते ॥ १२ ॥ नामूर्तेस्तेन सङ्गोऽस्ति नभसेव वपुष्मतः । मूर्तं च दृश्यते लग्नं तस्माद्दैवं न विद्यते ॥ १३ ॥ विनियोक्रथ भूतानामस्त्यन्यच्चेज्जगत्त्रये । शेरते भूतवृन्दानि दैवं सर्वं करिष्यति ॥ १४ ॥ दैवेन त्वभियुक्तोऽहं तत्करोमीदृशं स्थितम् । समाश्वासनवागेषा न दैवं परमार्थतः ॥ १५ ॥ मूढैः प्रकल्पितं दैवं तत्परास्ते क्षयं गताः । प्राज्ञास्तु पौरुषार्थेन पदमुत्तमतां गताः ॥ १६ ॥ ये शूरा ये च विक्रान्ता ये प्राज्ञा ये च पण्डिताः । तैस्तैः किमिव लोकेऽस्मिन्वद दैवं प्रतीक्ष्यते ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

किस अधिष्ठान को लेकर दैवभ्रान्ति होती है ? ऐसी शंका होने पर अधिष्ठान को दिखलाते हुए परस्पर व्यवहार का स्पष्टीकरण करते है । अपने कर्मफल की प्राप्ति होने पर इस कर्म का इस क्रम से अनुष्ठान किया था, इसलिए इस प्रकार फल प्राप्त हुआ, ऐसे जो वाग्व्यवहार होते हैं, वे ही दैवनामसे लोकमें प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं । उन वाग व्यवहारो में मन्दबुद्धि पुरुष यह दैव है, इस प्रकार का भ्रान्ति से निश्चय करते हैं जैसे कि भ्रान्ति से रस्सी में यह सर्प है, ऐसा निश्चय गृहीत होता है जैसे अतीत काल के दुष्कर्म वर्तमान काल के शुभ कर्मो से शोभा को प्राप्त होते हैं, वैसे ही पूर्वजन्म के दुष्कर्म इस जन्म के शुभ कर्मो से शुभफलप्रद हो जाते हैं, इसलिए पुरुष को प्रयत्नपूर्वक उद्योगी होना चाहिए । जिस मन्दमतिका मूढो द्वारा अनुमान से सिद्ध दैव है, अर्थात्‌ जो दुर्मति मूढो द्वारा & वैराग्य प्रकरण सर्ग २५ में - अत्रैव दुर्विलासानां चूडामणिरिहाऽपरः । करोत्यत्तीति लोकेऽस्मिन्‌ दैवं कालश्च कथ्यते ॥ तेनेयमखिला भूतसन्ततिः परिपेलवा । तापेन हिममालेव नीते विधुरतां मृशम्‌ ॥ नृत्यतो हि कृतान्तस्य नितान्तमिव रागिणः । नित्यं यितिकान्तायां मुने परमकामिता ॥ (सर्ग २५) कल्पित दैवको मानता है, उस दुर्मति को मैं भाग्य से नहीं ही जलूँगा ऐसा निश्चय कर अग्निकुण्ड में कूद पड़ना चाहिए | यदि कर्ता धर्ता सब कुछ दैव ही है, तो पुरुष की चेष्टा से क्या प्रयोजन है ? स्नान, दान, उठना, बैठना, बोलना आदि सभी व्यापारों को दैव ही कर देगा । मनुष्य को शास्त्रोंका उपदेश देने से किस फलकी सिद्धि होगी, क्योंकि यह पुरुष तो बोलने के लिए भी स्वतन्त्र नहीं है दैव जैसा चाहता है वैसा उससे नाच नचाता है, फिर इस संसार में किसको क्या उपदेश दिया जाय ? इस लोक में शव को छोड़कर अन्य किसी में भी चेष्टाका अभाव नहीं देखा गया है, चेष्टा से ही फलप्राप्ति होती है, दैव से नहीं, इसलिए दैव निरर्थक हे । मूर्तिरहति दैव मूर्तियुक्त पुरुष का सहकारी नहीं देखा जाता, इसलिए दैव निरर्थक है । जैसे लिखना, काटना आदि कार्यो में लेखनी, छूरा आदि और अंग परस्पर सम्बद्ध होते हैं, सम्बद्ध हुए दोनों में से एक में ही क्रियाकारिता देखी जाती है, दूसरे में नहीं, वैसे ही हस्त आदि के रहनेपर उनसे ही ग्रहण आदि क्रिया होगी दैव उनसे अन्यथा सिद्ध होने के कारण करण नहीं हो सकता और वातरोग आदि द्वारा हाथ आदि अंगों के नष्ट हो जाने पर दैव से कहीं पर कुछ नहीं किया जाता अतएव हाथ, पैर, मन, बुद्धि आदि के सदुश क्रिया के करणत्वरूप से भी दैव की कल्पना की आशा नहीं करनी चाहिए । बच्चे से लेकर विद्वानों तक को मन और बुद्धि के सदृश भी इस दैव का अनुभव नहीं होता, इसलिए भी देव सदा असत्‌ ही है, क्योकि उस के अस्तित्व का किसी को भी अनुभव नहीं होता । किंच, दैव की सिद्धि में कर्ता आदि कारक बुद्धि ही प्रमाण हे अथवा उससे पृथक्‌ बुद्धि ? प्रथम पक्ष में कर्ता आदि ही दैव शब्द से कहे जायें तो देव केवल कर्ता आदि का दूसरा नाम ही ठहरा द्वितीय पक्ष में क्रिया में उपयोग रहित किसी दूसरे की देव इस नाम से व्यर्थ ही कल्पना करनी होगी । यदि कहिए कि सभी पाण्डित्य आदिरूप समान फल की अभिलाषा से पढ़ते हैं उनमें से कुछ ही को अध्ययनफल पाण्डित्य आदि प्राप्त होते है सबको नहीं, इस विषमता में किसी न किसी निमित्त की अवश्य कल्पना करनी चाहिए | कार्य की जो विषमता देखी जाती है वह दैव की कल्पना में प्रमाण है, यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योकि कार्यविषम्य को दैव की कल्पना मेँ प्रमाण मानो, तो कार्यविषम्य से पूर्व जन्म के पौरुष की ही कल्पना क्यों नहीं करते ? अप्रसिद्ध दैव की कल्पना की क्या आवश्यकता है ? जैसे मूर्तियुक्त हम लोगों का अमूर्तं आकाश से संयोग नहीं हो सकता वैसे ही अमूर्त दैव का अन्य कारण के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः मूर्त का ही परस्पर संयोग दिखाई देता है, अतः दैव कोई पदार्थ नहीं है । यदि प्राणियों को व्यापार में लगानेवाला दैव नामक कोई होता तो तीनों लोकों में सब प्राणी दैव ही सब कुछ करेगा ऐसा निश्चय कर सो जाते । दैव से प्रेरित हुआ मैं देव के संकल्प से सिद्ध ऐसा कार्य करता हूँ, यह वचन आश्वासनमात्र है परमार्थतः दैव कोई पदार्थ नहीं है । मूर्ख लोगों ने अपने मन से दैव की कल्पना कर रक्खी है, जो लोग दैव पर निर्भर रहे उनका सर्वनाश ही हुआ है; बुद्धिमान्‌ पुरूष तो पौरुष का अवलम्बन कर उत्तम पद को प्राप्त हुए है । भला कहिए तो सही जो लोग शूरवीर हैं, जो पराक्रमशाली हैं, जो बुद्धिमान्‌ हैं और जो विद्वान हैं क्या वे इस लोक में दैव की प्रतीक्षा करते हैं