Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 8, Verses 22–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 8, verses 22–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 22-26
संस्कृत श्लोक
उत्साद्य देवसंघातं चक्रुस्त्रिभुवनोदरे ।
पौरुषेणैव यत्नेन साम्राज्यं दानवेश्वराः ॥ २२ ॥
आलूनशीर्णमाभोगि जगदाजह्रुरोजसा ।
पौरुषेणैव यत्नेन दानवेभ्यः सुरेश्वराः ॥ २३ ॥
राम पौरुषयुक्त्या च सलिलं धार्यतेऽनया ।
चिरं करण्डके चारु न दैवं तत्र कारणम् ॥ २४ ॥
भरणादानसंरम्भविभ्रमश्रमभूमिषु ।
शक्तता दृश्यते राम न दैवस्यौषधेरिव ॥ २५ ॥
सकलकारणकार्यविवर्जितं निजविकल्पवशादुपकल्पितम् ।
त्वमनपेक्ष्य हि दैवमसन्मयं श्रय शुभाशय पौरुषमुत्तमम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जो इन्द्र आदि देव हैं, वे भी पौरुष से पराजित हुए थे, यह बात प्रसिद्ध है ।
हिरण्यकशिपु आदि दैत्यराजो ने अपने पुरुषप्रयत्न के अवलम्बन से ही देवताओं को
तहस-नहस कर तीनों भुवनो में साम्राज्य किया था और इन्द्र आदि देवराजो ने पौरुष के
अवलम्बन से ही शत्रुसेना को काटकर और जर्जरितकर इस विशाल जगत् को दानवो से
छीना था । हे रामजी, राल एवं मधुमक्खी का छत्ता आदि के लेपन आदिरूप प्रसिद्ध
पौरुषयुकिति से बाँस की टोकरी में चिरकाल तक बड़ी खूबी के साथ पानी रक्खा जाता है,
इसमें पौरुष ही कारण है, दैव नहीं । आत्मीयजनों का भरण-पोषण, जबरदस्ती दूसरे के
राष्ट्र को छीन लेना, क्रोध से दूसरे को दण्ड देना, भोग-विलास एवं अन्यान्य रोगादिनिवृत्ति
आदिरूप परिश्रमसाध्य पुरुषार्थो के प्रति पराक्रम, मणि, मन्त्र ओर ओषधि में जैसी शक्ति
देखी जाती है वैसी देव में शक्ति नहीं है, वे सब पौरुष से ही सिद्ध होते हैं | हे साधुचरित
श्रीरामजी, सम्पूर्ण कारणों और कार्यो से रहित अपने भ्रम से बने हुए के सदुश मिथ्यारूप
असत्य देव की उपेक्षा कर तुम उत्तम पौरुष का अवलम्बन करो