Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । भगवन्तत्वधर्मज्ञ प्रतिष्ठामलमागतम् । यल्लोके तद्वद ब्रह्मन्दैव नाम किमुच्यते ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

पुरुषप्रयत्न की स्वतन्त्रता को सिद्ध करने के लिए पहले कहीं पर "दैव असत्‌ है” ऐसा कहा और कहीं पर प्राक्तन प्रयत्न जनित कर्म ही दैव एवं पुरुष प्रयत्न कहलाता है, ऐसा कहीं पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि "दैव असत्‌ है“ इस प्रथम पक्ष को मानने से लोक और वेद में दैव की जो प्रबल प्रसिद्धि है, उसकी असंगति हो जायेगी और दुर्बल दैव के अभाव में उसकी अपेक्षा पुरूषप्रयत्न की प्रबलता का प्रतिपादन करनेवाली उक्ति के साथ विरोध होगा । प्राक्तन प्रयत्न जनित कर्म ही दैव है, इस द्वितीय पक्ष में तो दैव असत्‌ है“ इस प्रकार की दैव में असत्त्वप्रतिज्ञा का भंग हो जायेगा, आधुनिक प्रवृत्तियाँ भी पूर्वकर्म की फलरूपा हैं, अत: प्राक्तन कर्मो के अनुकूल होने के कारण उनका विरोध न होने से आधुनिक प्रवृत्तियों से पूर्वकर्म का जय होता है, यह कथन भी विरुद्ध होगा एवं कर्मपरतन्त्र होने पर पुरुष की स्वतन्त्रता का भी विघात होगा, इस प्रकार के गूढ़ अभिप्रायवाले श्रीरामचन्द्रजी उसके तात्पर्य की जिज्ञासा से वस्रिष्ठजी से पूछते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, आप सम्पूर्ण धर्मौ के ज्ञाता हैं, लोक में अत्यन्त विख्यात जो दैव है, वह क्या है ? यानी वह सत्‌ है, या असत्‌ ? उसे आप कृपया मुझसे कहिए

सर्ग सन्दर्भ

आठवाँ सर्ग समाप्त नौवाँ सर्ग दैव के अपलाप की सिद्धि के लिए सफल कर्मो की मनोमात्रता और मन की चिदात्मताका वर्णन |