Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
पौरुषं सर्वकार्याणां कर्तृ राघव नेतरत् ।
फलभोक्तृ च सर्वत्र न दैवं तत्र कारणम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
रामचन्द्रजी के पूछने पर उनके अभिप्राय को जानकर श्रीवसिष्ठजी भी दैव का अपलाप
करनेवाली युक्तयो से ही जगत् के अपलाप द्वारा अद्वितीय आत्मतत्व को समझाने की इच्छा
से ूरवोक्ति दोनों पक्षों मे फलतः कोई भेद नहीं है, इस गूढ अभिप्राय से प्रथम पक्ष का अवलम्बन
कर उक्त अर्थ को ही कहते है ।
वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, सम्पूर्ण कार्यो को करनेवाला पौरुष ही हे, अन्य नहीं है
एवं सम्पूर्ण फलों का उपभोक्ता भी पुरुषप्रयत्न है, उसमें दैव कारण ही नहीं है । वस्तुतः
आत्मा स्वयं उदासीन है, अतः उसमें कर्तृत्व ओर भोक्तृत्व की किसी प्रकार भी उपपत्ति नहीं
होती