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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

एष एव मनोजन्तुर्यद्यत्प्रयतते हितम् । कृतं तत्तदवाप्नोति स्वत एव हि दैवतः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

श्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन्‌ वाक, पश्यँश्रक्षु: श्रण्वन्‌ ओत्रं मन्‍वानो मनः “ इस श्रुति से अध्यास से मन आदि भाव से स्थित आत्मा की ही कर्म ओर कर्म के फलरूप से भी स्थिति है, इसलिए वही दैव है, ऐसा यदि कहो, तो वह दैव रहे उससे पुरुष की स्वतन्त्रता का विनाश नहीं होगा, इस आशय से कहते है । मन आदि भाव को प्राप्त हुआ यह प्राणी ही अपने हित के लिए जैसा प्रयत्न करता है दैवनाम से प्रसिद्ध अपने कर्म से वैसा ही फल पाता हे