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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

यदैवं तानि कर्माणि कर्म साधो मनो हि तत् । मनो हि षुरुषस्तस्माद्दैव नास्तीति निश्चयः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

क्योकि “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृक्तिकेत्येव सत्यम्‌” (विकार और नाम केवल वाचारम्भणमात्र है, मृत्तिका ही (कारण ही) सत्य है) श्रुति में उक्त ऐसा न्याय है । यद्यपि वाचिक और कायिक भी कर्म देखे जाते हैं तथापि विचार करने पर वे भी केवल मनोवासनारूप ही हैं, ऐसा आगे कहा जायेगा, उसी के अनुसार सकल कर्म मनोवासनामात्र हैं, ऐसा कहा गया है । मन पुरुष (परमात्मरूप) ही है, उससे पृथक्‌ नहीं है, क्योकि (तन्मनोऽकुरुत आत्मन्वी स्याम“ (ने मनस्वी होऊँ, इस अभिप्राय से उसने मन को बनाया) इस श्रुति से मन पुरुष का विवर्तरूप ही है, यह सिद्ध है । हे सज्जनशिरोमणि श्रीरामजी, जो दैव है, वही कर्म है, दैव कर्म से पृथक्‌ नहीं है, कर्म मन से पृथक्‌ नहीं है और मन पुरुषरूप है और पुरूष परमार्थरूप से निर्विकार चैतन्यमात्ररूप ही है, इससे मन असत्‌ ठहरा, मन के असत्‌ होने से कर्म भी असत्‌ ठहरा और असत्‌ कर्मरूप दैव भी असत्‌ हुआ, अतएव दैव नहीं है, यह फलितार्थ है