Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
एवं कर्मस्थकर्माणि कर्मप्रौढा स्ववासना ।
वासना मनसो नान्या मनो हि पुरुषः स्मृतः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्मकर्ताओं के सभी कर्म इरी प्रकार होते हें । अपनी प्रबल
वासना ही कर्म है और वासना भी अपने कारणभूत मन से पृथक् नहीं है