Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
वासनौघेन शुद्धेन तत्र चेदद्य नीयसे ।
तत्क्रमेण शुभेनैव पदप्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रथम पक्ष में कहते हैं ।
यदि आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ शुभ हों, तो पूर्वजन्म की शुभ वासनाओं द्वारा इस
समय भी आप शुभ वासनामें प्राप्त कराये जा रहे हैं, ऐसी अवस्था में शुभ वासनाओं द्वारा ही
क्रमशः अविनश्वर पद को प्राप्त होगे, इसमें कोई सन्देह नहीं हे