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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

पूर्वे चेद्धनतां याता नाभ्यासात्तव वासना । वर्धिष्यते तु नेदानीमपि तात सुखी भव ॥ ३७ ॥ संदिग्धायामपि भृशं शुभामेव समाहर । अस्यां तु वासनावृद्धौ शुभाद्दोषो न कश्चन ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

वासनाओं के अभ्यास की विफलता की शंका नहीं करनी चाहिए, क्योकि पूर्ववासना ओं के अभ्यास का फल प्रत्यक्ष है, ऐसा कहते है । हे शत्रुनाशन, जब आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ अभ्यासवश घनीभाव को (निविडता को) प्राप्त हुई हैं, तब आप अभ्यास की सफलता को जानिए । हे पुण्यचरित, पूर्व की भोति इस समय भी अभ्यासवश आपकी वासना घनीभाव को प्राप्त हो रही है, इसलिए शुभवासनाओं का ही अभ्यास कीजिए ॥३५, ३ ६॥ पूर्वजन्म की वासनाओ के घनीभाव में भी सन्देह कर रहे श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं । हे प्रिय, यदि पूर्वजन्म में अभ्यास से आपकी वासना घनीभाव को प्राप्त नहीं हुई, तो इस समय भी वह वृद्धि को प्राप्त नहीं होगी, इसलिए आप सुखी होइए | भाव यह कि पूर्वजन्ममें अभ्यासवश वासनाएँ वृद्धि को प्राप्त नहीं हुई, इस जन्म में भी वे अभ्यासवश दृढ़ नहीं होगी, ऐसी अवस्था में आप राजकुमारोचित सुख पूर्वक व्यवहार कीजिए, दुर्वासनाओं की अभिवृद्धि से जनित अनर्थ की संभावना से आपको विषाद नहीं होना चाहिए