Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verses 39–40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verses 39–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 39,40
संस्कृत श्लोक
यद्यदभ्यस्यते लोके तन्मयेनैव भूयते ।
इत्याकुमारं प्राज्ञेषु दृष्टं संदेहवजितम् ॥ ३९ ॥
यूभासना युक्तस्तदत्र भव भूतये ।
परं पोरुषमाश्रित्य विजित्येन्द्रियपञ्चकम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
वस्तुतः तो इस विषय में सन्देह का अवसर ही नहीं है, क्योकि अन्य स्थलों से भी अभ्यास
में अभ्यस्यमानकी (जिसका अभ्यास किया जाता है उसकी) ढढता की हेतुता देखी जाती है,
ऐसा कहते है ।
लोक में मनुष्य जिस-जिस विषय का अभ्यास करता है, उसी में निःसन्देह तन्मय हो
जाता है, यह बात बाल कों से लेकर बड़े-बड़े विद्वानों तक में देखी गई हे । हे श्रीरामचन्द्रजी,
इसलिए आप परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए परम पुरुषार्थ का अवलम्बन कर और पाँचों
इन्द्रियों को अपने वश में कर शुभ वासना से युक्त होइए