Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verses 4–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
सिद्धस्य पौरुषेणेह फलस्य फलशालिना ।
शुभाशुभार्थसंपत्तिर्दैवशब्देन कथ्यते ॥ ४ ॥
पौरुषोपनता नित्यमिष्टानिष्टस्य वस्तुनः ।
प्राप्तिरिष्टाप्यनिष्टा वा दैवशब्देन कथ्यते ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
निरालम्बत्वरूप अनुपपत्तिका परिहार करते हैं।
फल को अवश्य देनेवाले पुरुषप्रयत्न से सिद्ध वनिता आदि को पति ओर सपत्नी आदि से
जो कुछ और अशुभ फल प्राप्त होता है, उसीका अवलम्बन कर दैवशब्द का लोक में व्यवहार
होता है। अथवा पुरुषप्रयत्न द्वारा प्राप्त इष्ट ओर अनिष्ट वस्तु की जो इष्ट ओर अनिष्टरूपा
प्राप्ति हे, वह भी सदा लोगों द्वारा दैवशब्द से कही जाती हे