Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verses 7–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verses 7–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 7-10
संस्कृत श्लोक
ननु राघव लोकस्य कस्यचित्किंचिदेव हि ।
दैवमाकाशरूपं हि करोति न करोति च ॥ ७ ॥
पुरुषार्थस्य सिद्धस्य शुभाशुभफलोदये ।
इदमित्थं स्थितमिति योक्तिस्तद्दैवमुच्यते ॥ ८ ॥
इत्थं ममाभवद्बुद्धितिथ मे निश्चयो ह्यभूत् ।
इति कर्मफलप्राप्तौ योक्तिस्तद्दैवमुच्यते ॥ ९ ॥
इष्टानिष्टफलप्राप्ताविदमित्यस्य वाचकम् ।
आश्वासनामात्रवचो दैवमित्येव कथ्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अब महामुनि वक्निष्ठजी सिद्धान्त बतलाते हैं ।
हे रामचन्द्रजी, किसी पुरुष का कोई देव ही भ्रान्त दृष्टि से आकाश को शून्य के सदृश या
नील के सदृश बना देता है और विवेक दृष्टि से वैसा नहीं बनाता है अर्थात् दैव की सिद्धि
भ्रान्ति से ही है, विवेक से नहीं । सिद्ध पुरुषार्थ से शुभ ओर अशुभ फल का उदय होने पर "यह
फल इस बीज के स्वरूप में पहले रहा” इस प्रकार जो कहा जाता है, वही दैव है। मेरी ऐसी बुद्धि
थी और ऐसा मेरा निश्चय था यों कर्मफल के प्राप्त होने पर जो कहा जाता है, वही दैव है। इष्ट
ओर अनिष्ट फल के प्राप्त होने पर प्राक्तन कर्म ही इस प्रकार था । इस अभिप्राय को
बतलानेवाला केवल आश्वासनमात्र ही दैव हे ॥