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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

यदिदं दृश्यते सर्वं जगत्स्थावरजंगमम् । तत्सुषुप्ताविव स्वप्नः कल्पान्ते प्रविनश्यति ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

ूर्वमेव हि यो यथा“ इससे उक्त अर्थ की उपपत्ति के लिए प्रलयावस्था में अवशिष्ट आत्मस्वरूप को कहने के लिए कारण में पूर्वसृष्टि के लय के प्रकार को द्ष्टान्तपूर्वक कहते हैं । जो यह चराचर सम्पूर्ण जगत्‌ दिखलाई देता है, वह सुषुप्ति में स्वप्न की नाई कल्पान्तमें (प्रलययकाल में) नष्ट हो जाता है