Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
इदं प्रकरणार्थं त्वं संक्षेपाच्छृणु राघव ।
ततः संकथयिष्यामि विस्तरं ते यथेप्सितम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवती श्रुति भी कहती है :
न निरोधो न योत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुश्षुर्न वै मुक्तिरित्येषा परमार्थता ॥
(न उत्पत्ति है ओर न प्रलय है, उत्पत्ति ओर प्रलय न होने से ही न बद्ध (संसारी जीव) है,
न साधक है, न मोक्षार्थी है और न मुक्त है, यह परमार्थ बात है ।)
यही इस प्रकरण का प्रतिपाद्य अर्थ है, यह बात आगे कहे जानेवाले विस्तार की भूमिका के
रूप में इस सर्ग में कही जाती है, ऐसा कहते हैं।
है राघव, आप पहले प्रकरण के उपोद्घात के लिए इस सर्ग में कहे जानेवाले अर्थ को
सुनिए, तदुपरान्त मैं आपसे आपकी इच्छा के अनुसार इसको विस्तारपूर्वक कहूँगा