Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
अतस्ते स्वावबोधार्थं तत्तावत्कथयाम्यहम् ।
उत्पत्तिः संसृतावेति पूर्वमेव हि यो यथा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि अपने स्वरूप के अज्ञान से ही बन्ध है, अत: अपने स्वरूप के बोध के लिए आगे
के ग्रन्थ से दृश्य प्रपंच का असंभव कहता हू । उत्पत्ति आदि का सम्बन्ध दृश्य संसार से है,
आत्मा से नहीं । आत्मा तो दृश्य प्रपंच की उत्पत्ति से पहले जैसा था वेसा ही रहता हे । अणुमात्र
भी उसमें विकार नही आता