Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
उत्पद्यते यो जगति स एव किल वर्धते ।
स एव मोक्षमाप्नोति स्वर्गं वा नरकं च वा ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल दृश्य के अभावमात्र से बन्धन की निवृत्ति कही है, पर यह ठीक नहीं जँचता, क्यों
कि उत्पत्ति, वृद्धि, नाश, स्वर्ग नरक आदि बन्धन आत्मा के धर्मरूप से प्रतीत होते हैं, अतः
मन्तेऽथो यत्र देव इव राजे-वाहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः (स्वप्न में इस स्वप्नदर्शक
पुरुषको शत्रु या अन्य चोर मारते-से हैँ, वशीभूत-सा करते हैँ, हाथी-सा इसको भगाता है, गङ्ख में
गिरता-सा है, जो हाथी आदिरूप जाग्रत भय को देखता है, उसीको स्वप्न में भी देखता है, स्वप्न में
भयके बिना भी मिथ्या ही उत्पन्न हुई अविद्या से भय मानता है। जिस काल में देवता के समान, राजा के
समान मैं ही सब हूँ, ऐसा मानता है । जो यह सर्वात्मभाव है वही इसका परम लोक है), "तद्य इह व्याघ्रो
वा सिंहो वा यद् यद्भवन्ति तदा भवन्ति“ (वे इस लोक में कर्म से प्राप्त जिस-जिस व्याघ्र आदि जाति को
प्राप्त हुए थे, वे उस कर्मज्ञान की वासना से वासित होकर सत् मं प्रविष्ट होकर भी फिर तद्-तद् भाव से
उत्पन्न होते हैं), "यच्चित्तस्तन्मयो भवति गृह्यमेतत्सनातनम्“ “मन कृतेनायात्यस्मिन् शरीरे" (जिस
वस्तु का चिन्तन करता है, तन्मय हो जाता है, यह परम गुह्य है ओर संकल्प द्वारा ही इस शरीर मेँ आता
है) इत्यादि श्रुतियाँ तथा “यंयं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा
तद्भावभावितः ॥ तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुश्मर युद्ध च ॥ (जिस जिस पदार्थ का स्मरण करते हुए
शरीर का त्याग करता है, उसी भाव को प्राप्त होता है इसलिए तुम सर्वदा मेरा स्मरण करो) इत्यादि
स्मृतिर्यौँ है। अभ्यासावस्था मेँ जो पुरुष संसारी आत्मा को या ब्रह्मभाव को जानता है, वह फलावस्थामें
भी उसको जानता है, इसलिए नित्य निरन्तर ब्रह्मानुभववासना को ही दृढ़ करना चाहिए, यह उत्पत्ति
प्रकरण का तात्पर्यार्थ है इत्यादि ।
उनका आत्मकोटि में अन्तभवि ठहरा, ऐसी स्थिति में दृश्य की निवृत्ति होने पर भी बन्धकी
निवृत्ति नहीं होगी, इस शंका पर कहते है ।
इस संसार में जो उत्पन्न होता है, वही वृद्धि, क्षय, स्वर्ग ओर नरक को प्राप्त होता है एवं
वही बन्ध ओर मोक्ष को प्राप्त होता है । उत्पत्ति, वृद्धि, विनाश, आदि धर्म आत्मा के नहीं हैं।
अपने स्वरूप का परिज्ञान न होने से ही उसको उत्पत्ति आदिका भ्रम होता है, यह तात्पर्य
है