Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
ऋतमात्मा परं ब्रह्म सत्यमित्यादिका बुधैः ।
कल्पिता व्यवहारार्थं तस्य संज्ञा महात्मनः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
विद्वानों ने व्यवहार के लिए (५) उस
सद्रूप सर्वव्यापक आत्मा के ऋत, आत्मा, पर, ब्रह्म, सत्य ([]) इत्यादि अनेक नामों की
५ यहाँ पर उपदेश के योग्य शिष्य आदि को उपदेश देना व्यवहार है, उस व्यवहार के लिए।
(3) वह सर्वश्रेष्ठ प्रमाणरूप श्रुति से जाना जाता है, अतः ऋत कहलाता है - "यच्चाऽऽप्नोति
यदादत्ते यच्चाति विषयानिह | यच्चास्य संततो भावस्तस्ममादात्मेति शब्दते ॥” (चूँकि सम्पूर्ण पदार्थों
को व्याप्त करता है, उनका ग्रहण करता है, भोग करता है और कभी नष्ट नहीं होता, इसलिए यह
आत्मा कहा जाता है) वेदव्यासजी की इस उक्ति के अनुसार आत्मा, सत्यता के उत्कर्ष की अवधि
होने से पर, स्वयं बृहत् होने से या जगत् के आकार को बढ़ानेवाला होने से ब्रह्म, विद्वानों को
शास्त्रानुसार उसका अनुभव होता है, अतः सत्य कहलाता है ।
कल्पना कर रक्खी है