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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

अचेत्यचित्स्वरूपात्मा यत्र यत्रैव तिष्ठति । द्रष्टा तत्रास्य दृश्यश्रीः समुदेत्यप्यणूदरे ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि यह द्रष्टा पुरुष तप, ध्यान आदि के बल से दश्यशून्य तथा दृश्य के समावेश के अयोग्य परमाणु के उदर आदि में जाकर रहता हुआ दृश्य से छुटकारा पा जायेगा, ऐसी अवस्था में मोक्ष का अभाव कैसे होगा ? इस पर कहते है । आत्मा का तप आदि से भी परिज्ञान नहीं हो सकता । चिद्रूप आत्मा जिसको ज्ञात नहीं हेतु होने से संसार, अस्वतन्त्रता की जननी होने से बन्धन, मिथ्या होने से माया, भ्रम की हेतु होने से मोह, दुस्तर होने से महत्‌ और स्वरूप का आवरण करनेवाली होने से तम कही जाती है । हुआ, वह द्रष्टा जर्हौँ कहीं भी (परमाणु के मध्य में भी) रहेगा वहाँ परमाणु के उदर में भी उसको दृश्य की प्रतीति होगी ही । भाव यह है कि जिसको आत्मतत्त्व का परिज्ञान नहीं है, वह जीव ही दृश्य का बीज है, परमाणु के उदर में भी भ्रान्ति से विशालता की प्रतीति में विरोध न होने से वहाँ पर भी उसके दृश्यरूप बन्धन का निवारण नहीं हो सकता