Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
स्वप्नवत्पश्यति जगच्चिन्नभोदेहवित्स्वयम् ।
स्वप्नसंसारदृष्टान्त एवाहं त्वं समन्वितम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न की नाई आत्मा में आविर्भूत हुआ प्रतीत होता है” ऐसा जो पीछे कहा गया है,
उसका तात्पर्य स्पष्ट करते हैं।
जीवभाव को प्राप्त होकर जो जगत् को देखता है, वह स्वप्न की नाई देखता है अर्थात्
जैसे स्वप्नदर्शन विषय का बाध होने पर भी बाधित नहीं होता, वैसे ही जगद्दर्शन भी बाधित
२3 “यथावस्तु” का-परीक्षा द्वारा जैसी वस्तु है उसके अनुसार, "यथाक्रम का साधन और
युक्तियों के निरूपणपूर्वक और “यथास्वभाव' का जैसा श्रोता का स्वभाव है अर्थात् श्रोता की बुद्धि
की परिपक्रता के अनुसार, यह अर्थ करना चाहिए । अथवा “यथावस्तु/ से सृष्टि से पूर्व अवस्था का
कथन है, क्योंकि उस समय सम्पूर्ण सन्मात्र ही था । "यथाज्ञानम्' से सृष्टि के आरम्भ की उन्मुखता
का कथन है, “यथाक्रमम्” से स्थूलरूप से सृष्टि के क्रम का कथन है “यथास्वभावम्” से जगत् के
आरोप की दशा में भी वह अविकृतस्वभाव रहता है, इसका कथन है ओर "सर्वम् से ज्ञान से प्राप्त
होनेवाले पूर्णभाव का कथन है, "तस्मात्तत् सर्वमभवत्“ इस श्रुति में पूर्णभाव में सर्वशब्द देखा जाता
है । “बुध इससे उत्तम अधिकार का स्मरण कराना श्रवण में आदर उत्पन्न करने के लिए है।
हूँ, यों जानता है उसके ज्ञान का स्वप्न की नाई प्रायः बाध हो जाता है, वह दृढ़ नहीं रहता या जैसे
निद्रावशीभूत पुरुष अप्रसिद्ध अपने नक्षत्रनाम से धीरे धीरे पुकारे जा रहे वाक्य को ठीक ठीक नहीं समझ
पाता वैसे ही एक बार उपदिष्ट वाक्य के अर्थप्रकाश से भी मैं ही ब्रह्म हू" ऐसा ज्ञान नहीं होता । वही
पुरुष हे देवदत्त ! हे यज्ञदत्त ! यों चिरकाल के व्यवहार से प्रसिद्ध अपने नामके सम्बोधन से उत्पन्न ज्ञान
से जो जानता है वही जानता है वैसा असंदिग्ध आत्मबोध ही अविद्या के उच्छेद में हेतु है, यह अर्थ है।
वैसे दृढ़ निश्चय से युक्त अपरोक्ष अनुभव के लिए युक्तियों से फल की प्राप्ति होने तक पुनः पुनः
उपदेश का अभ्यास करना चाहिए । अथवा- जैसे ब्रह्मको न जाननेवाला पुरुष जाग्रत् काल की भय
आदि की चिरकालिक वासनाओं से वासित होकर स्वप्न में अविद्यावश निन्दा करना, धमकाना आदि
भीषण वाणियों से भय से काँपना, भागना, गड मेँ गिरना आदि से युक्त होकर दुःखी प्रतीत होता है, या
जैसे उपासक पुरुष जाग्रदूकाल की देहभाव वासना से वासित होकर स्वप्न में देवता के तुल्य, राजा के
तुल्य स्तुति, प्रशंसा आदि की वाणियों से और क्रीडा, विमान पर चढ़ना, आकाशविहार करना आदि
प्रतिभासे युक्त प्रतीत होता है वैसे ब्रह्मवेत्ता भी चिरकाल से भली भाँति अभ्यस्त श्रवण आदि से वासित
होकर स्वप्न में यह सब ब्रह्म ही है", "यह सब आत्मा ही है", “मैं ही यह सब हूँ/ इस प्रकार परमार्थ का
प्रतिपादन करनेवाली वाणियोँ से और वास्तविकं ब्रह्मभाव की प्रतिभासे दीप्त होता है, फलावस्था में भी
स्वप्न की नाई परलोकफल भी दृढ़ अभ्यस्त वासना के अनुसार होता है, इसका आगे लीलोपाख्यान
आदि में उपपादन किया जायेगा । शंका - इसमें क्या प्रमाण है समाधान - स्वप्न की नाई परलोक
फल भी वासना के अनुसार होता है, इस बात का "जो स्वयं ही (न कि अन्य किसी की अपेक्षा से) ज्ञान
कराते हैं, वे स्वशब्द हैं अर्थात् श्रुतियाँ उनसे उत्पन्न स्वतः प्रमाणभूत ज्ञान से निश्चय होता है । "अख
यत्रैनं ध्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छाद्यति गर्तमिव पतति यदेव जाग्रद्रयं पश्यति तदत्राविद्यया
नहीं होता | भाव यह कि ज्ञान की सत्यता में तात्पर्य है। अहम्" यों प्रत्यक् आत्मा के तादात्म्य
से ओर त्वम्" यों अनात्मभाव से भासित हो रहा प्रपंचरूप भी स्वप्नसंसाररूप दृष्टान्त में
भली भाँति सम्बद्ध है । भाव यह कि उसके मिथ्यात्व में तात्पर्य है। अथवा देह की स्वप्नतुल्यता
भले ही हो पर बाह्य नामरूपात्मक जगन्मात्र की स्वप्नतुल्यता कैसे हो सकती है ? इस शंका
पर कहते हैं । केवल बाह्मयरूप आदि ही नहीं भासता है, किन्तु मैं रूप को देखता हूँ, यों
त्रिपुटीभूत (अहम्” अर्थसे संवलित त्वमर्थरूप प्रकाशित होता है वह साक्षिमात्रजन्य होने से
स्वप्नसंसारदृष्टान्त में दार्ष्टान्तिक होता ही है । अध्यस्तविषयक ज्ञान में सत्य पदार्थ विषय
नहीं होता है। भ्रम में अध्यस्त का ही भान होता है और कुछ भी किसी तरह भासित नहीं
होता-इस सिद्धान्त के अनुसार बाह्य प्रमाणों के व्यवहारों में अर्थ के विसंवादमात्रसे भी
व्यावहारिक प्रमाण्य का विघात नहीं होता है, यह भाव है