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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 42–46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verses 42–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 42-46

संस्कृत श्लोक

आलीनवल्लरीरूपं यथा पद्माक्षकोटरे । आस्ते कमलिनीबीजं तथा द्रष्टरि दृश्यधीः ॥ ४२ ॥ यथा रसः पदार्थेषु यथा तैलं तिलादिषु । कुसुमेषु यथाऽऽमोदस्तथा द्रष्टरि दृश्यधीः ॥ ४३ ॥ यत्र तत्र स्थितस्यापि कर्पूरादेः सुगन्धिता । यथोदेति तथा दृश्यं चिद्धातोरुदरे जगत् ॥ ४४ ॥ यथा चात्र तव स्वप्नः संकल्पश्चित्तराज्यधीः । स्वानुभूत्यैव दृष्टान्तस्तथा हृद्यस्ति दृश्यभूः ॥ ४५ ॥ तस्माच्चित्तविकल्पस्थपिशाचो बालकं यथा । विनिहन्त्येवमप्येतं द्रष्टारं दृश्यरूपिका ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

अविद्यायुक्त द्रष्टा में दुष्य की स्थिति का दृष्टान्त द्वारा साधन करते हैँ । जैसे कमलगट्टे के अन्दर वह बीज विद्यमान है, जिसमें होनेवाली कमलिनी का लतारूप अन्तर्हित है, वैसे ही अज्ञानी द्रष्टामें वह दृश्य-बुद्धि रहती है, जिसमें भावी संसार अन्तर्हित है । जैसे पदार्थो में रस रहता है, तिल आदि में तेल रहता है ओर फूलों में सुगन्ध रहती है, वैसे ही द्रष्टामें दृश्य बुद्धि रहती ही है । कपूर आदि चाहे कहीं पर क्यों न हों, फिर भी जैसे उनसे सुगन्ध निकलती है, वैसे ही द्रष्टा चाहे कहीं पर क्यों न हो, फिर भी उसमें दृश्य रहता ही हे । जैसे आपके हृदय में स्थित मनोराज्यवुद्धि केवल आपके अनुभव से ही देखी जाती है ओर जैसे स्वप्न तथा संकल्प आपही के अनुभव से देखे जाते हैं, वैसे ही दृश्य जगत्‌ भी स्वानुभव से ही आपके हृदय में प्रतीत होता है । इसलिए जैसे चित्त द्वारा कल्पित पिशाच बालक को मार देता है, वैसे ही दृश्य रूपिका (&) (पिशाची) इस द्रष्टा को मार देती है यानी स्वरूप से भ्रष्ट कर देती है