Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 47–48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verses 47–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 47,48
संस्कृत श्लोक
यथाङ्कुरोऽन्तर्बीजस्य संस्थितो देशकालतः ।
करोति भासुरं देहं तनोत्येवं हि दृश्यधीः ॥ ४७ ॥
द्रव्यस्य हृद्येव चमत्कृतिर्यथा सदोदितास्त्यस्तमितोज्झितोदरे ।
द्रव्यस्य चिन्मात्रशरीरिणस्तथा स्वभावभूतास्त्युदरे जगत्स्थितिः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि सम्पूर्ण दृश्य हृदय में हैं, तो अभी सबको उसका अनुभव क्यों नहीं होता इस पर
कहते हैं।
जैसे बीज के भीतर स्थित अंकुर देश और काल से अपने को प्रकाशित करता है, वैसे
ही दृश्यबुद्धि भी देश और काल से अपने स्वरूप को प्रकाशित करती हे । जैसे अचिन्त्य
कार्यवैचित्रय्शक्तिरूप चमत्कार बीज आदि के भीतर रहता ही है, वैसे ही चिन्मात्रस्वरूप
आत्मा के ही उदर मेँ चिद् ओर अचित् से सम्बद्ध अतीत, अनागत जगत् की सत्ता रहती
हे