Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verses 1–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
महाप्रलयसंपत्तौ यदेतदवशिष्यते ।
भवत्येतदनाकारं नाम नास्त्यत्र संशयः ॥ १ ॥
न शून्यं कथमेतत्स्यान्न प्रकाशः कथं भवेत् ।
कथं वा न तमोरूपं कथं वा नैव भास्वरम् ॥ २ ॥
कथं वा नैव चिद्रूपं जीवो वा न कथं भवेत् ।
कथं न बुद्धितत्त्वं स्यात्कथं वा न मनो भवेत् ॥ ३ ॥
कथं वा नैव किंचित्स्यात्कथं वा सर्वमित्यपि ।
अनयैव वचोभङ्ग्या मम मोह इवोदितः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
महाप्रलय में जो सद्रूप कुछ अवशिष्ट रहता है, “वह न तेज है ओर न तम है“ इत्यादि
विरुद्ध स्वरूप को असंभावित समझकर वसिष्टजी की उक्ति के तात्पर्य को जानने के लिए
उत्सुक श्रीरामचन्द्रजी दोनों में से एक अर्थ की संभावना करते हुए प्रश्न की भूमिका बोधते हैं ।
श्रीरामजी ने कहा : महाप्रलय होने पर जो यह "सत्" अवशिष्ट रहता है, वह आकाररहित
है, इसमें तो संशय ही नहीं है, लेकिन वह शून्य नहीं है, यह कैसे ? वह प्रकाश स्वरूप नहीं
है, यह कैसे ? तमोरूप नहीं हे, यह कैसे ? न भास्वर ही है, यह कैसे ? तथा न चिद्रूप ही
है, यह कैसे ? अथवा वह जीव कैसे नहीं हो सकता, वह बुद्धित्व केसे नहीं हे अथवा मन
केसे नहीं है, वह केसे कुछ नहीं है ओर कैसे सब कुछ हे, आपकी इस वचनभंगी से मेरे मन
में मोह-सा उत्पन्न हो गया है
सर्ग सन्दर्भ
नैौर्वौँ सर्ग समाप्त दसवाँ सर्ग पूर्वोक्त ब्रह्मलक्षण मेँ विरोध की -सी संभावना कर उसके परिहार द्वारा उक्त ब्रह्म-लक्षण के तात्पर्य का वर्णन ।