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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verses 5–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verses 5–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 5-9

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । विषमोऽयमतिप्रश्नो भवता समुदाहृतः । भेत्तास्म्यहं त्वयत्नेन नैशं तम इवांशुमान् ॥ ५ ॥ महाकल्पान्तसंपत्तौ यत्तत्सदवशिष्यते । तद्राम न यथा शून्यं तदिदं श्रृणु कथ्यते ॥ ६ ॥ अनुत्कीर्णा यथा स्तम्भे संस्थिता शालभञ्जिका । तथा विश्वं स्थितं तत्र तेन शून्यं न तत्पदम् ॥ ७ ॥ अयमित्थं महाभोगो जगदाख्योऽवभासते । सत्यो भवत्वसत्यो वा यत्र तत्र त्वशून्यता ॥ ८ ॥ यथा न पुत्रिकाशून्यः स्तम्भोऽनुत्कीर्णपुत्रिकः । तथा भातं जगद्ब्रह्म तेन शून्य न तत्पदम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, आपने भ्‌ "कारणं कारणानाम्‌“ इससे तत्पद के वाच्य अर्थ का निर्देश है, ^अजमजर०* यहाँ से लेकर "सकलकलनशून्यम्‌" तक तत्पद के लक्ष्य अर्थ का निर्देश है । "विश्वं वेदनम्‌“ से तीनों अवस्थाओं के द्रष्टतारूप त्वंपद के वाच्य अर्थ का निर्देश है ओर "अवेद्यं वेदनम्‌“ से वेद्य तीनों अवस्थाओं से निर्मुक्तत्वरूप त्वंपद के लक्ष्य अर्थ का निर्देश है । मेरे आशय को ठीक न समझ कर यह प्रश्न किया है, अतएव यह विषम (टेढ़ा) प्रतीत हो रहा हे । जैसे सूर्य अपने स्वभाविक प्रकाश से रात्रि के अन्धकार को विनष्ट कर देता है, वैसे ही मैं भी अपने अभिप्राय के उद्घाटन द्वारा आपके सन्देह को छिन्न -भिन्न कर देता हूँ। वत्स श्रीरामजी, महाप्रलय होने पर जो सत्‌ अवशिष्ट रहता है, वह वैसा शून्य नहीं हे, जैसा कि आप समञ्जते हैं, इसी को मैं कहता हूँ, आप ध्यान देकर सुनिए | जैसे न गढी गई प्रतिमा खम्भे में स्थित रहती है, वैसे ही यह विश्व उसमें स्थित है, अतः वह शून्य नहीं है। भाव यह कि जैसे खम्भे में न गढ़ी गई प्रतिमा की खम्भे की सत्ता से अतिरिक्त सत्ता न होने से खम्भे की सत्ता से ही वह स्थित रहती है, इसलिए जब कि वह खम्भे में नहीं गढ़ी गई, तब भी उसमें उसकी स्थिति का विनाश नहीं होता। इसी प्रकार यह प्रचुर भोगों से पूर्ण जगत्‌-नाम का प्रपंच व्यवहारतः सत्य और परमार्थतः असत्य भले ही हो, इसमें हमारा आग्रह नहीं है, पर जिस अधिष्ठान में इसका भान होता है, वहाँ पर इसकी शून्यता नहीं है, कारण कि शून्य का न तो आरोप हो सकता है और न वह अधिष्ठान ही हो सकता है। जैसे वह खम्भा, जिसमें कि प्रतिमा नहीं गढ़ी गई है, प्रतिमाशून्य नहीं है, वैसे ही ब्रह्म भी जगत्‌शून्य नहीं है । शिल्पी के कौशल से प्रत्येक खम्भे में प्रतिमा की अभिव्यक्ति हो सकती है, अतः जिसमें प्रतिमा नहीं खोदी गई, वह खम्भा प्रतिमाशून्य नहीं कहा जा सकता, अतः तत्पद (ब्रह्म) जगत्‌ से शून्य नहीं है, यह कथन ठीक ही है