Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
न कदाचिदुदेतीदं परस्मान्न च शाम्यति ।
\\xa0इत्थं स्थितं केवलं सद्ब्रह्म स्वात्मनि संस्थितम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त रीति से ब्रह्म मेँ जगत् की सत्ता भले ही हो, किन्तु जगत् की उत्पत्ति और विनाश
की जो कि परस्पर विरोधी हैं, उसमें एक ही काल में सत्ता कैसे मानी जा सकती है ? इस प्रकार
शंका कर जगत् के उदय और विनाश की उनके धर्मी जगत् से अतिरिक्त सत्ता नहीं मानी गई
है, इसलिए उनकी धर्मिसत्ता से पथक् सत्ता के (धर्मी से पृथक् सत्ता के) निरास के विषय में
संभावना ही नहीं है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
वास्तव में यह जगत् परब्रह्म से न कभी उदित होता है और न उसमें अस्त को प्राप्त होता
है, केवल सद्ब्रह्म ही पूर्वोक्त रीति से अपने स्वरूप में स्थित हे