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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

अशून्यापेक्षया शून्यशब्दार्थपरिकल्पना । अशून्यत्वात्संभवतः शून्यताशून्यते कुतः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोड कहे कि यदि शून्य नहीं है, तो नोदेति”, “न शाम्यति” इस प्रकार शून्यार्थक नञ्‌ से उसका उल्लेख कैसे किया ? तो इस पर कहते हैं। उसकी जो शून्यरूप से कल्पना की जाती है, वह अशून्य की अपेक्षा से हे ओर शून्य की अपेक्षा अशून्य की कल्पना है । यदि केवल एकमात्र शून्य या अशून्य ही होता, तो शून्य ओर अशून्य की कल्पना ही कैसे हो सकती ? भाव यह कि प्रतियोगी मेँ (जिसका अभाव कहा जाता है वह प्रतियोगी है) अशून्यता की कल्पना कर उस कल्पित अशून्यता की अपेक्षा से अन्य वस्तु में उसकी शून्यता (अभाव) की कल्पना होती है और कल्पित शून्यता की अपेक्षा से प्रतियोगी में अशून्यता की कल्पना होती है, इस प्रकार जिनकी कल्पना परस्पर सापेक्ष हे, ऐसी शून्यता और अशून्यता हो ही कैसे सकती हैं 2