Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
स्वानुभूतिः प्रकाशोऽस्य केवलं व्योमरूपिणः ।
योऽन्तरस्ति स तेनैव नत्वन्येनानुभूयते ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्रकाश ब्रह्म मे तम की स्थिति कदापि नहीं हो सकती | इसलिए “न तमः“ कथन उचित
ही है । यहाँ पर (तु“ शब्द मायारूपी तम की व्यावृत्ति के लिए है ।
ब्रह्म की स्वप्रकाशता की अनुभव से सिद्धि करते है ।
चिदाकाशरूपी इस ब्रह्म का प्रकाश स्वानुभवैकगोचर है, अर्थात् ब्रह्म के प्रकाश के लिए
अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है, किन्तु वह केवल स्वानुभव से ही होता है। जो सर्वान्तर
आत्मा है, उसका वही अनुभव कर सकता है, अन्य नहीं । यद्यपि बुद्धि आदि का अनुभव अन्य
से होता है, तथापि जो बुद्धि आदि का आन्तर है, उसका वही अनुभव कर सकता है, उसके
लिए अपने से अतिरिक्त अनुभव की अपेक्षा नहीं करता