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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verses 22–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verses 22–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 22-26

संस्कृत श्लोक

तस्माद्यादृक्चिदाकाशमाकाशादपि निर्मलम् । तदन्तस्थं तादृगेव जगच्छब्दार्थभागपि ॥ २२ ॥ मरीचेऽन्तर्यथा तैक्ष्ण्यमृते भोक्तुर्न लक्ष्यते । चिन्मात्रत्वं चिदाकाशे तथा चेत्यकलां विना ॥ २३ ॥ तस्माच्चिदप्यचिद्रूपं चेत्यरिक्तं तदात्मनि । जगत्ता तादृगेवेयं तावन्मात्रात्मतावशात् ॥ २४ ॥ रूपालोकमनस्कारास्तन्मया एव नेतरत् । यथास्थितमतो विश्वं सुषुप्तं तुर्यमेव वा ॥ २५ ॥ तेन योगी सुषुप्तात्मा व्यवहार्यपि शान्तधीः । आस्ते ब्रह्म निराभासं सर्वाभाससमुद्गकः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ को ही स्पष्ट करते हैं। इसलिए आकाश से भी निर्मल चिदाकाश ब्रह्म जैसा निराकार है, वैसा ही निराकार उसके अन्दर स्थित "जगत्‌" शब्द का अर्थभूत दृश्य प्रपंच भी हे । जैसे मिर्चा खानेवाले पुरूष के बिना मिर्चे के अन्दर विद्यमान तीक्ष्णता (कडुवेपन) का परिज्ञान नहीं हो सकता, वैसे ही चिदाकाश में दृश्यता के बिना चिन्मात्रता का ज्ञान नहीं हो सकता । भाव यह कि यद्यपि दृश्य से अतिरिक्त ही सत्य (चिन्मात्र) दर्शनरूप से (साक्षीरूप से) प्रसिद्ध है, तथापि दृश्य का अभाव होने पर वह दर्शनत्वव्यवहार के योग्य ही नहीं होता । इसलिए चिदात्मक ब्रह्म में चेत्य से (दृश्य से) अतिरिक्तरूप चित्‌ हुआ भी अचित्‌ ही है चिद्‌ ओर अचित्‌ परस्पर सापेक्ष हैं, अचित्‌ के सर्वथा अभाव में चित्‌ भी अचित्‌ ही है। भाव यह कि जगत्‌ का लय होने पर चित्‌ की जगद्विषयतारूप चित्ता निवृत्त हो जाती है, अतएव प्रत्यगात्मा में चिद्‌ आदि शब्द लक्षणा से प्रवृत्त होते हैँ । यह जगत्ता भी वैसे ही है, भाव यह कि जैसे जगत्‌ का लय होने पर चित्‌ की जगद्विषयतारूप चित्तता निवृत्त हो जाती है । वैसे ही चिद्विषयकत्वरूप जगतकी जगत्ता भी निवृत्त हो जाती हे । बाह्य घट, पट आदि विषय तथा आभ्यन्तर सुख, दुःख आदि ब्रह्ममात्रस्वरूप होने के कारण ब्रह्ममय ही हैं, उससे भिन्न नहीं है, इसलिए यथास्थित, सुषुप्तिरूप और तुर्यरूप (५४५) सम्पूर्ण विश्व ब्रह्मरूप ही है । इसलिए सम्पूर्ण संस्कारों का कोषरूप सुषुप्तात्मक योगी लौकिक व्यवहार करता हुआ भी संस्काररहित ब्रह्म ही है