Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
चिद्रूपमेव नो यत्र लभ्यते यत्र जीवता ।
कथं स्याच्चित्तताकारा वासना नित्यरूपिणी ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जो अपने में विषयप्रकाशनरूप चिट्रूपता को भी सहन नहीं कर सकता, वह अनुकूल और
प्रतिकूल विषयभोक्तृत्वकूप जीवता को कैसे सहन कर सकेगा, ऐसा कहते हैं ।
जहाँ पर चिद्रूपताका ही लाभ नहीं हो सकता, वहाँ पर चित्तताकार जीवता और वासना
कैसे रह सकती हैं